STORYMIRROR

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

4  

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

फिर सपने हो गये राख।

फिर सपने हो गये राख।

1 min
404


सूरज निकला, धूल उड़ी,

फिर सपने हो गए राख,

रोटी की खुशबू आई ,

मगर पेट फिर भी खाली रहे।।


चूल्हा बुझा, हांडी ठंडी,

बच्चों की आँखें प्यासी रहे,

रात को पानी पीकर सोए,

जब सुबह भी उदासी रहे।।


हाथों में छाले, तन पर बोझ,

दिनभर पसीना बहता रहा,

मजदूरी की गठरी बाँध के आई,

पर फिर भी पेट खाली रहा।।


रास्ते लांघे, शहर भी घूमा,

दुआओं में अनाज मांगता रहा।

मगर हर दुआ अनसुना कर गया,

किस्मत भी जैसे रूठा रहा।।


ख्वाब नहीं, कोई उम्मीदें भी नहीं,

बस सांसें यूं ही चलती रही,

जाने कल क्या होगा,भगवन

बस भूख से तन तड़पती रही।।






विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy