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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy

"पाला बदल लेते है"

"पाला बदल लेते है"

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लोग तो सुविधानुसार पाला बदल लेते है।

लोग तो सुविधानुसार बाप बदल लेते है।।


मतलब में तो लोग इतने बुजदिल रहते है।

अपनी परछाई तक को भी वो ठग लेते है।।


उन्हें देखकर आईने भी शर्मिंदा रहते है।

कैसे लोग प्रतिदिन ही उसे छल लेते है।।


लोग स्वार्थ खातिर, गधे को अश्व कहते है।

एक फूटे हुए घड़े से भी जल भर लेते है।।


कैसे यकीन करें, साखी अब किसी पर।

लोग गिरगिट से ज्यादा रंग बदल लेते है।।


उनके ही दिमाग यहां पर निर्मल रहते है।

जो लोग निःस्वार्थ कर्म की पहल रहते है।।


जो इस दुनिया में पर्वत जैसे अटल रहते है।

ये दुनियादारी छल उनके आगे नत रहते है।।


वही लोग इस दुनिया में एक कमल रहते है।

जो इस दुनियादारी कीच में निश्छल रहते है।।


आजकल के लोग चाहे कितना पाला बदले।

अंततः सत्यवान ही यहां पर अव्वल रहते है।।


इस दुनिया के अंदर जो लोग सरल रहते है।

ईश्वर उन भोले लोगों के साथ हरपल रहते है।।



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