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meghna bhardwaj

Tragedy

4  

meghna bhardwaj

Tragedy

निर्भयाः दरिंदगी की एक घटना

निर्भयाः दरिंदगी की एक घटना

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रात का वो समय था

रोड़ लाइट भी बंद पड़ी थी

चारो ओर सन्नाटा पसरा था। 

मै घबराई हुई खड़ी थी।


कांपते हाथी से अपने बदन को जकड़े

हुए खड़ी थी।

जाना था मुझको घर जल्दी रात बहुत हो गयी थ

मम्मी का फोन बार - बार

आ रहा था


तभी अंधेरे मे मुझे कोई

आवाज लगा रहा था

मै बिल्कुल डर गई थी 

पसीने से लथपथ एक जगह पर इस्थिर हो गई थी 


तभी डर से पीछे मुड़कर देखा 

3 लड़के कम उम्र के

मुझे बुला रहे थे

दीदी जाना है कहां, हम ले जाते है।


आओ बैठो बस मे

'दीदी' सुनकर मानो मैने उनपर भरोसा किया 

मन मे थोड़ा डर था।

मगर मेरी मजबुरी थी 


मैं फिर जाके बस मे

आगे की सीट पे जा बैठी

पर एक डर सा सता रहाथा।

मन में बार बार माँ का ख़याल आ रहा था 


मेरे अलावा उस बस मे और भी 4 लड़के थे सवार 

बस अपनी रफ्तार मे थी

धीरे-धीरे उन लड़को ने आगे आना शुरू करा 

मै बहुत घबरा जाती हूँ कुछ करू उससे पहले

-वो सब आके मुझे घेर लेते है।

 मैं चीखती हूँ, चिल्लाती हूँ, मदद के लिए किसी को बुलाती हूँ 


मेरी आवाज पर बस मे ही दबकर रह जाती है।

छीना झपटी, रवीचा तानी 

बदन पर मेरे उन नाषुरो ने

अनगिनत खरोचे थी मारी

 

दरिंदो की तरह मेरे बदन को निचोड़ा था गया 

बेसुध में हो गई जब

तो मुझे बस से बाहर था फ़ेंक दिया गया

घर मे मेरी मां इंतजार मेरा देख रही थी


कब आऊंगी मै वापिस आखिर

ये सोच परेशान हो रही होगी

तभी पापा के पास एक

फ़ोन आता है।


और तभी घर का शांत माहौल

एक अजीब वातावरण मे बदल जाता है।

दबती हुई आवाज मे पापा

घर मे बतलाते है। 


हॉस्पिटल मे मेरी 

हालत देखकर सब

घबरा जाते है।


सबको समझ आ जाता है

बीते पलो मे किन हादसो

से गुजरी हूं मै। 


जीवन की डोर मेरी लम्बी नहीं खींच पाती ,

मुझे जाना ही पड़ता है।

ज़िम्मेदारी पर मेरी घरवालो को दो थी मैंने।

मुझे पता था मुझे इंसाफ़ ज़रूर दिलाएँगे


वक्त बहुत ही लगा, मगर पाप का घड़ा तो फूटना ही था।

सजा मिली आरोपियों को मेरे सारे फाँसी पर झूल गये।

सो रही है देश की जनता और देश प्रशासन, लेकिन जा चुकी है बेटी अब तू नहीं बचेगा दुर्शाशन


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