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Vivek Gulati

Abstract

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Vivek Gulati

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ना सीखी होशियारी

ना सीखी होशियारी

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क्या ज़रूरी है आगे बढ़ कर रिश्ते निभाना, 

कोई न करे कद्र... फिर भी गले लगाना |


सबको पूछते- पूछते ज़िंदगी बीती,

बदले में न मिला सम्मान और प्रीति |


रिश्तों में प्यार व वफ़ा ढूँढता रहा..

पढ़ा-लिखा हो कर भी समझ न सका |


कई सीख जाते हैं चोट लगने पर,

यहाँ ज़ख्मों के निशां बयाँ करते हैं मेरे भोलेपन का सफ़र |


मन करो पक्का और चमड़ी मोटी,

बराबरी का रिश्ता निभाओ...

वरना जीने नहीं देगी यह दुनिया खोटी |


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