ना सीखी होशियारी
ना सीखी होशियारी
क्या ज़रूरी है आगे बढ़ कर रिश्ते निभाना,
कोई न करे कद्र... फिर भी गले लगाना |
सबको पूछते- पूछते ज़िंदगी बीती,
बदले में न मिला सम्मान और प्रीति |
रिश्तों में प्यार व वफ़ा ढूँढता रहा..
पढ़ा-लिखा हो कर भी समझ न सका |
कई सीख जाते हैं चोट लगने पर,
यहाँ ज़ख्मों के निशां बयाँ करते हैं मेरे भोलेपन का सफ़र |
मन करो पक्का और चमड़ी मोटी,
बराबरी का रिश्ता निभाओ...
वरना जीने नहीं देगी यह दुनिया खोटी |
