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Vivek Gulati

Abstract

4  

Vivek Gulati

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व्यक्तित्व का पतन

व्यक्तित्व का पतन

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समय था जब मुँह से निकले बोल,

माने जाते थे हीरे से भी अनमोल।

स्थायी होती थी विचारधारा,

सिद्धांतों का मिलता था सहारा।

शब्दों में होता था वजन,

सोच-समझकर दिए जाते थे वचन।

गिरगिट-सा रंग बदलना नहीं था चलन,

इसी से बनता था व्यक्तित्व का दर्पण।

अब विचारधारा हुई हाथों का मैल,

हर धुलाई में बदल जाता उसका खेल।

कल जो कहते थे पूरब की बात,

आज पश्चिम के गाते हैं गीत दिन-रात।

रीढ़ बिना ऐसे कितने इंसान,

बना न सके जीवन में अपनी पहचान।

बड़े-बड़े लोग करते हैं बातें हल्की,

मौका पड़ते ही मार जाते हैं पलटी।

सिद्धांतों का जिनको नहीं ध्यान,

कैसे पाएँगे वे सच्चा सम्मान?

ऐसा व्यक्तित्व भला किस काम का,

रीढ़ बिना झूलता नाम भर इंसान-सा।

खुद को चाहे सोचे महान,

इतिहास में रह जाता है अनजान।


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