STORYMIRROR

Vivek Gulati

Abstract

4  

Vivek Gulati

Abstract

आदर्शवाद की क़ीमत

आदर्शवाद की क़ीमत

1 min
0



आदर्श बनने के लिए,

बहुत कुछ खोना पड़ता है।

त्याग और बलिदानों का,

अक्सर मोल न मिलता है।


बलिदान की कोई कीमत नहीं,

एहसान भी कोई नहीं मानता।

जिसके लिए सब कुछ करते रहो,

मौके पर वो नहीं पहचानता ।


आदर्श माँ अगर न होती,

थोड़ा और सो लेती।

अपनी उमंगों के संग,

ज़िंदगी जी भर के जी लेती।


पिता जी भी नए कपड़े सिलवाते,

अपने कुछ अरमान सजाते।

सिर्फ दूसरों की खातिर न जीते,

अपने सपने भी पूरे कर पाते।


अगर दोस्तों का साथ छोड़ देता,

अच्छे नंबर पा लेता।

थोड़ा और आगे बढ़कर,

ज्यादा हासिल कर लेता।


दुनियादारी में फँसकर,

सबको खुश करने में लगा रहा।

न कोई पूरी तरह खुश हो पाया,

अपने आप को भी तरसाता रहा।


इस एहसान-फ़रामोश दुनिया में,

सब अपनी ही सोचते हैं।

जो हर पल औरों के लिए जिए,

वो अक्सर खुद को खोते हैं।


इसलिए थोड़ा अपने लिए भी सोचो,

चिंता से मुक्त रहोगे।

अपने सपनों और अरमानों को,

खुलकर जियोगे।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract