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Sushil Sharma

Abstract

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Sushil Sharma

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है उजाले का निमंत्रण

है उजाले का निमंत्रण

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है उजाले का निमंत्रण क्यों तमस की बात हो    

आज तम को हम मिटाएँ फिर नवल शुरुआत हो  


हर निशा तम को समेटे द्वार पर मेरे खड़ी

रक्त को अपना जला कर सुबह की शुरुआत हो


आज सूरज सुबह से ही उन सवालों में घिरा

चाँदनी अब चीखती है रौशनी की बात हो   


है अगर विद्रोह का स्वर तो भला मैं क्या करूँ

सच कहूँगा मैं हमेशा चाहे मेरी मात हो


दीप हूँ जलता रहूँगा अन्ध से लड़ कर सदा  

हो उजाला हर नगर में चाहे कितनी रात हो

  

राह में मेरी हमेशा शूल कंटक पीर हैं 

पाँव अब रुकने नहीं हैं चाहे झँझावात हो।


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