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Shubha Shukla Mishra Adhar

Abstract

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Shubha Shukla Mishra Adhar

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शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य

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जीवन का प्रतिपल विशेष है।

जब तक हिय में नेह -लेश है।।


बादल कितनी कमर कसें पर,

लुप्त हुआ क्या कभी दिवाकर?

रात अमावस की छा जाती,

किन्तु पूर्णिमा छुप क्या पाती?

गहन कालिमा - हरण हेतु ही,

मन्दहास  करता  निशेश है।।

जब तक हिय में नेह - लेश है।।

जीवन का ••••


शब्दों  की अपनी गरिमा है,

भावों की अनुपम महिमा है।

मृदु  मंत्रों  के  पुष्पहार  से,

अनघ हृदय सत शुभ विचार से।

प्राण - युक्त होती प्रतिमा भी,

नर ! नारायण  तू महेश है।।

जब तक हिय में नेह- लेश है।।

जीवन का •••


अलख  निरखते  मर्महीन हैं,

कुछ अज्ञानी  दग्ध - दीन हैं।

शूल लिये कटु तीक्ष्ण विषैले,

तज कर ममता  हुए कसैले।

कर्म - कथन में जिनके अन्तर,

निस्पन्दन ही मात्र  शेष  है।।

जब तक हिय में नेह -लेश है।।

जीवन का ••••


जन्म-मरण का भय क्या करना,

क्या डरना क्यों किससे डरना?

विधि का अजब खेल है देखा,

पुण्य - पाप का अद्भुत लेखा।

जीवन - घट अनुराग - उदधि से,

कर अर्जन अक्षय निवेश है।।

जब तक हिय में नेह-लेश है।।

जीवन का ••••


वसुधा - वल्लभ वरुण - वृष्टि से,

हो प्रमुदित नभ- प्रणय- दृष्टि से।

सदा वर्तिका शलभ वरण कर,

दिव्य प्रीति देती हैै जलकर।

कृष्ण - राधिका 'अधर' बाँसुरी,

पूज्य प्रेम का अतुल वेश है।।

जब तक हिय में नेह-लेश है।।

जीवन का •••••


  


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