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Vivek Gulati

Abstract

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Vivek Gulati

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दिल्ली का दिल

दिल्ली का दिल

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दिल वालों की दिल्ली अब रूखी हो रही है...

जहाँ अकड़े हुए हैं लोग,

हवा में भी ज़हरीली मिलावट है...

फैले हुए हैं बहुत सारे रोग |


दिल हो रहे हैं छोटे...

मगर सड़के बन रही हैं चौड़ी,

जलते हैं हम लोगों को आगे बढ़ता देख...

मौके पर काटते है उनकी सफलता की डोरी |


गुस्सा हमारा रहने लगा है नाक पर...

ट्रैफिक और पार्किंग से ये ओर बढ़ता है |

लड़ने, मारने के लिए तैयार हैं क्यूँकि...

हर किसी का बाप कुछ ना कुछ होता है |


बाहरी लोगों को अपना बनाती...

हर भाषा और संस्कृति को देती सम्मान |

विविधता में ही एका है...

दिल्ली की है यही शान |


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