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Baman Chandra Dixit

Tragedy Classics Inspirational


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Baman Chandra Dixit

Tragedy Classics Inspirational


मुस्कान दर्द सा

मुस्कान दर्द सा

1 min 203 1 min 203

ग़म छुपाने का इतना आदी हो चला

गुम हो चले हैं ख़ुसी की लकीरें भी।

गर कभी कराहना चाहते लकलिफें

दबी जुबान में दर्द शिकायत करता।


बिखरे अरमानों को समेटते कोशिशें

"सब ठीक है"का मुखौटा चेहरेपे लेकिन

कुछ ही हाथ आते, फिसल जाते बहुत

सूखे होंठ मगर मुस्कान मधुर उकेरता।


खुद को झांकने की ज़रा भी जी नहीं

पहचान ना ले कहीं ख़ुद ही ख़ुद को।

मलालों में मिला कर सुर्ख़ लाल लेप

चेहरे पे मल कर आरसी निहारता।


ख़ुद ही को तौलता उनके तराज़ू में,

रोज़ रोज़ बाज़ार भाव आंकता छोटा।

खरा को खोटा बनाने की साज़िश

मज़बूर फ़र्ज़ बन बेआबृ बिलखता।


फिर भी जीने की जिद्द फौलादी,

अंदर की खोखले पन को छिपाकर।

रेसा रेसा में चिनगारी की चमक

माचिस की पेटी सी संजो के रखता।

मुस्कान दर्द सा मगर अपना सा लगता।


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