उन्मुक्त आकाश
उन्मुक्त आकाश
अपने आँगन का एक टुकड़ा चांद को पहचानते होगे तुम टीम टीमाते फिरते कुछ सितारों को भी जानते होंगे बख़ूबी। मगर पहचानोगे कैसे छोटी सी एक साया से समूचे काया को एक काव्यांश से काव्य समग्र ! समझोगे भी कैसे सारा आकाश को , आंकलन करपाओगे कैसे सीमा असीम का! दिगंत प्रसारी विस्तीर्ण वेलाभूमि को नाप पाओगे कैसे तुम्हारे रेत-लिप्त दो कदमों से? हाँ , मुमकिन हो सकता अगर तुम आते कदम दो कदम मेरे तरफ और मैं बढजाता दो चार कदम तुम्हारे तरफ ... मिट जाती दूरियां दरमियाँ फासलें कम हो जाते मन भी तुम्हारा मुक्त हो जाता उन्मुक्त आकाश के तरह दृष्टि परिधि की उस छोर तक । महसूस करपाते तुम चाँद को और उसकी चाँदनी को लोमकूप की शीतल स्पर्सों से , और देखपाते नज़र भर उन छोटी छोटी खुशियों को टीमटीमाते सितारों की तरह । देखो न .. इन लहरों को लौटते हैं कैसे फिर आने का वादें देकर और यह वेलावालुका भी अंगीकार कर लेती ; समा लेती अपने ही अंदर मिलन से जुदाई तक के सारे मुहूर्त्तों को । देखो तो मेरे तरफ एक बार खुली आँखों से चश्मा उतार कर सब साफ साफ दिखेगा और समझ भी जाओगे तुम बिन तुम्हारे महज़ूदगी के कितना अधूरा हूँ मैं , और ये महजुदा तमाम मुहूर्त्त ? शब्द सभी व्रह्म हो जायेंगे यह चाँद , ये सितारें और यह मुक्त आकाश और भी उन्मुक्त हो जाएंगे एवं सुविस्तृत हो जाएगा तुम्हारे आँगनका नन्हा आकाश । **************************
