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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Tragedy Inspirational

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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Tragedy Inspirational

नीरव रहता हूँ

नीरव रहता हूँ

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अपने इलाके से जुदा कर खुद को
अनजाने सहर में आशियाँ बनाया हूँ
मैं उन्हें छोड़ा या वो छोड़ चले मुझे
पूछ न सका उन्हें , खुद से पूछता हूँ ।।

फ़र्ज़ निभाते निभाते मजबूर हो गया
चाही थी नज़दीकी लेकिं दूर हो गया
अपनों को खोतागया अपनों के लिये कैसे
पूछ न सका उन्हें , खुद से पूछता हूँ ।।

जवाब मालूम , मगर मंजूर उन्हें नहीँ
मेरी मजबूरी उनकी ज़िम्मेवारी तो नहीँ
फिर क्या बोलूं या फिर कैसे बोलूं उन्हें
पूछ न सका उन्हें , खुद से पूछता हूँ ।।

अब तो जवाब मेरा मुझे ही मिलगया
घर का था नहीँ जो बाहर का हो गया
घर की बात घर में दमतोडे तो अच्छा
किसीसे पूछें क्या , अब नीरव रहता हूँ ।।     


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