मोबाइल =वक़्त की बर्बादी
मोबाइल =वक़्त की बर्बादी
दौर बदले, नियम बदले और बदल गयी जिंदगानीयाँ,
वक़्त के लपेटे में मोबाइल में सिमट गयी ज़िन्दगीयाँ।।
मिलना, भेंटना, खेलना-कूदना, दुर्लभ हुआ बतियाना,
अनुभवी बुजुर्गों के ज्ञान से वंचित हो रहा ज़माना।।
काम हैं अब फेसबुक, ट्विटर, एप्प्स व्हाट्सप्प खंगालना,
बस बेतुके, बेसिर पैर के अनावश्यक रीलों को टटोलना।।
फोन पर घंटों-घंटों गर्दन टेढ़ी करके बातें करना,
फ़ोन अमर्यादित रिचार्ज करके अपने ही समय को गँवाना।।
आराम करने के समय में मोबाइल हाथ में रहता,
नींद, चैन, सुकून फ़ोन की उल-जुलूल खबरों में उड़ जाता।।
रिश्ते, अपनत्व, वात्सल्य, एहसास सब मोबाइल खा गया,
समय का फेर देखो बदलते समय ने समय को निगल लिया।।
