मज़हब नहीं सिखाता
मज़हब नहीं सिखाता
दिल जीतने का हो ख़ूबसूरत अंदाज़।
कोई किसी से प्यार करने लग जाता।
रंग, रूप, उम्र, जाति का रहे लिहाज़।
यह बात कोई मज़हब नहीं सिखाता।
प्रेमी दिल की होती है कोमल भावना।
समाज के कठोर रिवाज़ न देख पाता।
उसने साथी की सच्ची नींव को जाना।
समाज की झूठी दीवारों को है गिराता।
दोनों प्रेमी एक दूजे के संग खुश रहते।
यह देख समाज कहाँ है खुशी मनाता।
मगर जब प्रेमी डटकर हर ज़ुल्म सहते।
तब यही समाज इन्हें सिर पर बैठाता।

