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Pankaj Kumar

Abstract

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Pankaj Kumar

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मीठी-कड़वी यादें

मीठी-कड़वी यादें

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जब बड़ी फुर्सत में बैठे हुए 

पीछे मुड़ कर देखा तो 

पुरानी यादें ताज़ा हो गयी 

खुली ऑंखें इक नींद में सो गयी 


सारा सफर इक ख्वाब जैसे दिखने लगा 

अपने ही अच्छे बुरे का हिसाब जैसे दिखने लगा 

जो अच्छा था देख कर चेहरा खिल गया 

जो बुरा था उस पर दिल पिघल गया

अपनी बेबसी, हिम्मत, हौसला देखा 

जो मेहनत से जो बनाया वो घोंसला देखा 


अपने प्यार की पहली मुस्कान देखी 

इश्क़ में ऊँची उड़ान देखी 

वक़्त धीरे-धीरे गुजर रहा था 

मैं मंजिल की ओर बढ़ रहा था 


फिर एक मुसीबतों का दौर आया 

एक नहीं चारों ओर आया 

एक-एक कर हाथ छूटते देखा 

प्यार को भी अपने टूटते देखा 

दिल की ख्वाहिशें दिल में रह गयी 

दबे-दबे लफ़्ज़ों से अपनी कहानी कह गयी 


तभी एक हलचल हुई  

और ध्यान हटा 

देखते हुए ख्वाबों से जगा 

मैं तो यहाँ हूँ, ये ख्याल आया 

इन चंद लम्हों में ही पूरा जीवन

फिर जी आया 


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