दूर खड़ी वह, कुछ अनबनी-सी,
छिपी हताश, दिखी उतावल।
शांत चूड़ियाँ, मौन है पायल,
अस्त-व्यस्त पट, मन है घायल।।
न चमकती खिली तरुणाई,
हारी वदन की भी अरुणाई।
नयन लज्जित, पलकें मुरझाई,
राह किनारे खड़ी, घबराई।।
शब्द नहीं हैं पास में उसके,
भाषा भी मूक बन आई।
देखकर उसे संसार हंसता,
यही सोचकर वह अकुलाई।।
हिम्मत करके, बढ़ी दो कदम,
फिर रुक, भय से वो बौराई।
जैसे नैनों से तकती राहों को,
हर कोशिश पर वो घबराई।।
समझ नहीं पाई, घबरा रही;
वो, जैसे हो खुद ही सताई।
पास जाकर पूछा किसी ने,
मुख-मुख में वो बुदबुदाई।
अविरल सबको देख-देख,
आँखें उसकी भर-भर आई।
रोने को आतुर थी ऐसी,
हर एक साँस ने चीख लगाई।
पकड़ स्वयं का आँचल,
संकेतों से समझाती, शरमाती।
अधखुले-खुले अंगों को,
कर प्रयत्न हाथों से छिपाती।
कुछ अलग भाषा, अलग
थी उसकी अपनी बोली।
शून्य भरा नैनों में उसके,
फटी-फटी थी चोली।
मुश्किल था समझना उसको,
बैठ बात की, तो समझ आया।
रोती-बिलखती, इस जगत में,
घूमती रही, वदन मुरझाया।
समझकर विपदा उसकी,
हर एक हृदय ने चीत्कार किया।
केवल दो रोटी की खातिर,
फिर रिश्तों ने बलिदान दिया।
अपनों ने अपनों को छोड़ा,
मर्यादा का अपमान किया।
एक बेटी ने बेटी की खातिर,
खुद को फिर नीलाम किया।
लुटी देह, समर्पित मन
कलुषित हृदय, मन भारी।
हर बार तिरस्कृत हुई,
सुलभ बनी, भाग्य-मारी।
माँ, बहन, बेटी, पत्नी बन
जिसने यह संसार रचा।
रौंद रहा क्यूँ, संसार इन्हें
असुर बना, व्यभिचार नचा ।
सरल है, ज्ञापित नहीं वो।
गरल है , शापित नहीं वो।
कोमल है, कठोर भी वो।
शीतल है, विभोर भी वो।
बन सुधा-रस बरसती , वो।
प्रेम को ज़रा से, तरसती वो।
अनंत भावों से,सजती वो।
लज्जित, तिल-तिल जलती वो।
अब न रुकेगी, जाग उठी वो,
ख़ुद से ख़ुद को, दाग चुकी वो।
बनकर नूतन भाग्य-विधाता,
महाकाल की आग उठी वो।
By Pratima Devi
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