जलता शहर--
जलता शहर--
("बेबस मुकद्दर और सुलगते हालात... जब चारों तरफ़ तपती दोपहर हो, तो सफ़र आसान नहीं होता। पढ़िएगा ज़रूर, 'जलता शहर'। )
नफ़रतों के शहर में, ऐसे हम जियें कैसे।
हर तरफ़ ही ज़हर है, लबों को सियें कैसे।।
किधर से भी आ जाएँ, ये सौदागर परिंदे।
पहर-ए-ख़ौफ़ है ऐसा, परों को सिलें कैसे।।।
जिधर भी देखो, फैला गुबार ही गुबार है।
ज़हर-ए-हवा में भी भला, साँसें भरें कैसे।।
इधर की हवाओं में भी, अब बहार नहीं।
हर-सू असर-ए-ख़िज़ाँ है, गुल खिलें कैसे।।
आब-ए-चश्म भी फ़िज़ूल हुआ कुछ इस तरह,
कि अब इन ख़्वाबों में भी नर्मियाँ रहे कैसे।
मुअल्लक़ रिश्तों की, कभी सुनवाई नहीं।
हरसू मौज-ए-फ़रेब है, यूँ आँखें मूँदें कैसे।।
तकल्लुफ़ न कर 'नीरस' मौका-ए-वारदात है।
चारों तरफ़ क़हर है, बे-वजह ज़िरह कियें कैसे।।
By Pratima Devi
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