मातृत्व का एहसास
मातृत्व का एहसास
"मातृत्व केवल जन्म देने से नहीं, बल्कि दिल और रूह के जुड़ाव से परिभाषित होता है। यह कविता पराए बच्चे के प्रति उमड़ने वाले निश्छल प्रेम और एक माँ के अटूट संकल्प की भावुक अभिव्यक्ति है। बिना खून के रिश्ते के भी कैसे एक मासूम छुअन औरत को 'माँ' बना देती है, इसी जादू को बयां करती मेरी एक रचना--"
मातृत्व का एहसास
कुछ तो था उसकी आँखों में,
जो अपनी ओर खींच रहा थी।
वो छोटी-छोटी भोली-सी आँखें!
जाने उनमें कितनी गहराई थी।
मन उसे देख आतुर होने लगा,
हृदय की धड़कनें भी अब क्यों,
बेतहाशा शोर मचाने लगी थीं।
ज़ुबान जैसे तालू से चिपकी थी।
होंठों की कोरें सूखने लगी थीं,
लगा जैसे हर लम्हा उसका था।
उसकी नन्हीं उँगलियों ने जब,
अचानक मेरे हाथों को छुआ था।
जुड़ा न था रक्त का तार कोई,
फिर भी वो ममता का साया था।
उसकी मासूम छुअन से ही तो,
माँ होने का अनुभव पाया था।
उस एक स्पर्श में था कोई जादू,
जिसने हर बंधन को तोड़ दिया।
इस रूह के सूने कोने-कोने को,
एक अनकहे रिश्ते से जोड़ दिया।
कोख से मेरी जन्म न लिया,
पर ममता में कोई कमी न थी।
उसने थामी थी उँगली मेरी,
आँखों में उसके नमी न थी।
जब खिली उसके होंठों पर,
वो एक प्यारी-सी मुस्कान।
सदियों की थकावट मिट गई,
तब मिली मुझे नई पहचान।
वो नन्हा-सा स्पर्श उसका,
अब मेरी बाँहों में सिमटा था।
खुदा का भेजा नन्हा तोहफा,
मेरी किस्मत से लिपटा था।
पराया होकर भी उस रिश्ते को,
मेरी ही रूह ने पहचाना था।
बिन जन्म दिए जो बन बैठी माँ,
वो प्यार मेरा अनजाना था।
उस अनजाने प्यार में बँधकर,
हर ख़्वाब से अब याराना हुआ।
अपनी जाँ से ज़्यादा चाहूँ उसे,
उसकी ख़ुशी पे दिल दीवाना हुआ।
होंठों से छूकर उसका माथा,
मन ही मन एक वादा किया।
हर धूप-छाँव में साथ रहूँ सदा,
यह संकल्प मैंने आज लिया।
By Pratima
---🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸---
