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Pratima Devi

Abstract Classics

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Pratima Devi

Abstract Classics

दरिया से समंदर तक-

दरिया से समंदर तक-

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ख़ुद को भुला, दरिया सी बहना चाहती हूँ।
इस वक़्त से, मैं भी कुछ कहना चाहती हूँ।।

यूँ तो हर पल यादों को सजा, ज़िंदा रही।
फ़िर से बनके समंदर, ठहरना चाहती हूँ।।

महरूम हर ख़ुशी से, ज़िंदगी उधार रही।।
जरा सी ख़ुशी पाकर, बहकना चाहती हूँ।।

कभी ग़ैर अपने हुए, कभी अपने ग़ैर रहे।
आज फ़िर ख़्वाबों सी चहकना चाहती हूँ।।

हर दर्द में ख़ुशी ढूँढ़ी, दर्द ही ईमान बना।
उस हर दर्द में ख़ुद को, ढूँढ़ना चाहती हूँ।।

यूँ तो बदलते मौसम की ख़्वाहिश किसे थी।
फ़िर भी इनकी खुश्बू में महकना चाहती हूँ।।

अब ये वक़्त की बंदिशें भी, तन्हा-तन्हा हुईं।
इन्हीं बंदिशों से ख़ुदी को, चुराना चाहती हूँ।।

कितनी ख़्वाहिशें! नित दम तोड़ती रही।
उनकी मैयत में, खुद भुलाना चाहती हूँ।।

हर एक रिश्ते को, शिद्दत से पूजा मगर।
अब ख़ुद से ख़ुद को मिलाना चाहती हूँ।।

मंज़िलों की दौड़ में, शामिल होकर भी।
रास्तों से अनजान, दहकना चाहती हूँ।।

गुजर जाती है ज़िन्दगी बिन बात यूँ ही।
मैं गुजरते हुए लम्हों में जीना चाहती हूँ।।

यूँही भीड़ में खोने का अब डर किसे है।
बस कुछ पल सुकूँ से, रहना चाहती हूँ।।

By Pratima Devi 
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