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Pratima Devi

Tragedy Inspirational

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Pratima Devi

Tragedy Inspirational

मुलाकात--ख़ुद एककी ख़ुद से--

मुलाकात--ख़ुद एककी ख़ुद से--

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            "एक तरसती निगाह, एक कँपकँपाता लब और आँखों में छुपा एक आँसू। क्या यह कोई और थी, या मेरे ही भीतर का कोई अनजाना साया?"




 मुलाकात--ख़ुद एककी ख़ुद से--


 इक नन्हीं-सी आस लिए,
दरवाजे पर खड़ी थी वो।
उदास, बिखरे बाल लिए,
मुश्किलों में पड़ी थी वो।


 कातर निगाहों में अपनी,
अनगिनत सवाल लिए वो।
बस यूँही आहों में अपनी,
अनंत ख़्याल लिए वो।


 कितने प्रश्न जो दिख रहे,
उन गहरी-सी आँखों में।
लब उसके कँपकँपा रहे,
अपनी ही लहरी साँसों में।


 जाने क्यों सपनों-सा डर
लिए, डरा रही थी वो।
मुझको अपना जानकर,
यूँ ही हरा रही थी वो।


 एक अनजाना साया बन,
सहमी-सी खड़ी थी वो।
उदास आँखों में कई सवाल
लिए, ज़िद पर अड़ी थी वो।


 मिली उससे तो जाना,
क्या है अब उसके मन में।
झुकी पलकों में छुपा,
इक आँसू भीगे नयन में।


द्रवित क्यूँ हो! पास बुला,
जानना सौ बार मैं चाहूँ।
दुःखित क्यूँ हो! त्रास भुला,
पहचानना हर बार मैं चाहूँ।


 सोच में उसकी क्या है!
जाना, मगर जान न पायी।
अपनी सोच में ढूँढा तो!
ख़ुद को पहचान मैं पायी।


 By Pratima Devi

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