सागर से भी, गहरे दर्द--
सागर से भी, गहरे दर्द--
सागर से भी, गहरे दर्द।
जिनका कोई शोर नहीं।।
लाख ज़ुल्म सहे हँस के।
दिल कोई कमज़ोर नहीं।।
बेखौफ़ ज़ख़्म तड़पा रहे,
पर ये ग़म चितचोर नहीं।।
हरसू रवायतों का दंभ है,
पर माहौल घनघोर नहीं।।
बरसती हैं अँखियाँ भी,
पर इनमें कोई ओर नहीं।।
ज़िंदा तसव्वुर भी रोये,
पर ख़्वाबों पर ज़ोर नहीं।।
राहें अनजान हैं लेकिन,
मुश्किलें पुर-ज़ोर नहीं।।
कितनी शहादतें देकर,
भी हुई अभी भोर नहीं।।
मरते हैं हर रोज मगर,
मौत का हिलोर नहीं।।
कशमकश ज़िंदगी रही,
पर बेईमानी विभोर नहीं।।
उजड़ चुकी वो वादियाँ,
पर कोई झकझोर नहीं।।
सन्नाटा चीखकर कहता,
मुझमें भी कोई ज़ोर नहीं।।
गिरते शज़र ताकते रहे,
कोई हमसा कठोर नहीं।।
हसरतों का बाजार रहा,
पर यहाँ कोई शोर नहीं।।
उठती हुई निगाहें झुकी,
जिनमें कोई शोर नहीं।।
नीरस संसार की चाहतें,
तेरा भी कोई छोर नहीं।।
By Pratima Devi
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