"मुश्किलों के दौर में ख़ुद्दारी और आदमियत को सहेजती मेरी एक अदना सी कोशिश, 'मिल्कियत-ए-दिल'। उम्मीद है आपके दिलों तक पहुँचेगी।"
जियें इस तरह सदा कि खुद पे गुमान रहे बाक़ी।
औरों की नहीं, अपनी ही नज़र में मान रहे बाक़ी।।
मिलती है तक़दीर से ही अपनों की रहनुमाई।
पर याद रहे कि साथ परछाई अपनी रहे बाक़ी।।
महफ़ूज़ रख क़दम कि भटके न तू दर-बदर।
रुख़सत के वक़्त आँखों में अश्क रहे बाक़ी।।
ख़लिश में भी दिल में आदमियत रहे बाक़ी।
गर्द में रह कर भी, ये मिल्कियत रहे बाक़ी।।
इस्तक़बाल हरेक ज़फ़ा का मुस्कुरा के कर 'नीरस'।
कि तुझ पर ख़ुदा का वो एक मोज़िज़ा रहे बाक़ी।।
By Pratima Devi
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