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S N Sharma

Tragedy

4  

S N Sharma

Tragedy

वह नारी

वह नारी

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वह नन्ही सी कली।

जो मन के आंगन में खिली।

प्यार मांगती सब अपनों का

पर उसको हर पल सीख मिली।

बोझ मिला एहसासों का हर पल

बर्जनाओं की लीक मिली।

मर्यादाओं के पिंजरे में।

कैद किया उसको पंछी सा।

अरमान और सतरंगी सपने।

भूली रह गया याद सलीका।

छूट गए मां बाप और घर।

दिखा दिया घर नया पति का।

अंग अंग बांधा बंधन में।

बिछिया पायल मंगल टीका।

सेवा करती रही पति की।

मां बनकर बच्चों को पाला।

रही जगती खुद रातों को

औलादे को सुख दे डाला।

चिड़िया सी उड़ गई संताने

जब बुढ़ापे ने डेरा डाला

निपट अकेलापन जीवन का

अंत समय तोते सा पाला।



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