मेरी जिस्त पे जफ़ा किया
मेरी जिस्त पे जफ़ा किया
उसने मेरे सोजे - ग़म ( ग़म की तपन) पे इर्शाद (फ़रमान- फ़रमाया) किया ,
न जाने क्यों
मेरी सिब्त (लिखित) ए मोहब्बत पर भी दस्तख़त ( हस्ताक्षर ) किया ।
ना गिला किया , ना शिकवा किया,
मिलकर भरी महेफिल में उसने मुझे
अपनी निगह - लुत्फ़ (कृपा दृष्टि) से बड़ा बरबाद किया।
उसने मेरी शब-ए-हिज्राँ ( विरह की रात) पे चिलमन (पर्दा) किया,
न जाने क्यों
मेरी क़दीम ( पुरानी ) गज़ल पर भी सवाल किया।
ना फिक्र की, ना मलाल (रंजीदा, दुःख) किया ,
मिलकर भरी महफिल में उसने मुझे
अपनी तब्बशुम ( मुस्कुराहट ) से बड़ा एजाज़ ( सम्मान) दिया ।
उसने मेरी मता'-ए-दिल (दिल की दौलत ) को ना उम्मीदाना किया ,
न जाने क्यों
मेरे याद-ए-रफ़्तगाँ ( बीते दिनों की बात) मुश्त-ए-ग़ुबार ( मुठ्ठी भर ख़ाक ) किया ।
ना खफा किया, ना वफा किया,
मिलकर भरी महफिल में उसने मुझे
अपनी दीदा-ए-जानाँ ( प्रेमी - प्रेमिका की द्रष्टि) से बिस्मिल ( घायल ) किया ।
ए दोस्त, उसने मेरी उम्र दराज ( लम्बी आयु ) मांग कर
अपने दिल ऐ दागदार से
मेरी जिस्त ( जिंदगी ) पे जफ़ा ( जुल्म) किया ।

