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Saleha Memon

Romance Tragedy Fantasy

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Saleha Memon

Romance Tragedy Fantasy

मेरी जिस्त पे जफ़ा किया

मेरी जिस्त पे जफ़ा किया

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उसने मेरे सोजे - ग़म ( ग़म की तपन) पे इर्शाद (फ़रमान- फ़रमाया) किया ,

न जाने क्यों

मेरी सिब्त (लिखित) ए मोहब्बत पर भी दस्तख़त ( हस्ताक्षर ) किया ।


ना गिला किया , ना शिकवा किया,

मिलकर भरी महेफिल में उसने मुझे

अपनी निगह - लुत्फ़ (कृपा दृष्टि) से बड़ा बरबाद किया।


उसने मेरी शब-ए-हिज्राँ ( विरह की रात) पे चिलमन (पर्दा) किया,

न जाने क्यों

मेरी क़दीम ( पुरानी ) गज़ल पर भी सवाल किया।


ना फिक्र की, ना मलाल (रंजीदा, दुःख) किया ,

मिलकर भरी महफिल में उसने मुझे

अपनी तब्बशुम ( मुस्कुराहट ) से बड़ा एजाज़ ( सम्मान) दिया ।


उसने मेरी मता'-ए-दिल (दिल की दौलत ) को ना उम्मीदाना किया ,

न जाने क्यों

मेरे याद-ए-रफ़्तगाँ ( बीते दिनों की बात) मुश्त-ए-ग़ुबार ( मुठ्ठी भर ख़ाक ) किया ।


ना खफा किया, ना वफा किया,

मिलकर भरी महफिल में उसने मुझे 

अपनी दीदा-ए-जानाँ ( प्रेमी - प्रेमिका की द्रष्टि) से बिस्मिल ( घायल ) किया ।


ए दोस्त, उसने मेरी उम्र दराज ( लम्बी आयु ) मांग कर 

अपने दिल ऐ दागदार से

मेरी जिस्त ( जिंदगी ) पे जफ़ा ( जुल्म) किया ।



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