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Archana Saxena

Tragedy

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Archana Saxena

Tragedy

मैं नारी कोरोना की मारी

मैं नारी कोरोना की मारी

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मैं हूँ नारी, कोरोना की मारी

कब से कर रही ओवरटाइम

जब जाते थे सब घर से तो मैं थी

पाती कुछ आराम


खोल के बस अखबार आज का

चाय का कप हाथों में पकड़ती

रानी समझती उस पल खुद को

फुरसत से जब पेपर पढ़ती

झाड़ू पोंछे का नहीं झंझट 

बाई सब निबटाती थी


पेपर से जब फ्री हो जाती

मैं रेडियो चलाती थी

रात को सीरियल देखा नहीं जब

चिंटू ने चैनल बदला

पैर पसारे बिस्तर पर मैं

वह भी काम निबटाती थी


आह कोरोना क्या कर डाला

कैसे दिन ये दिखलाये

मैं ही दिन भर खटती रहती

नजर किसी को न आये


बाई भी नहीं आती घर में

झाड़ू पोंछा सब करना

उस पर ये फरमाइशें सबकी

अलग अलग पूरी करना

मदद को कोई तैयार नहीं है


सबको अपने अपने काम

बस मैं ही उन्हें खाली दिखती

कहाँ खोया मेरा आराम।


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