STORYMIRROR

Archana Saxena

Abstract

4  

Archana Saxena

Abstract

सुहाना सूर्योदय

सुहाना सूर्योदय

1 min
335

वह सूर्य की झाँकती पहली किरण

पूरब से उगी जैसे कोई मणि

अंबर ने धारण की हो ज्यों

मस्तक पर बिंदी प्रकाश जड़ी


नारंगी सूरज मनभावन

आकाश पे लाली बिखेर रहा

आया वह अपने अश्व पे चढ़

संग उसके अनगिनत हैं रश्मियाँ


सागर ने पाँव पखार इसे

स्वयं क्षितिज से भेजा अंबर में

इसने भी प्यार बरसाया है

क्या लाली छिटकी समुंदर में


ज्यों ज्यों ऊँचाई छूता यह

स्वर्णिम होता ही जाता है

दीवानी धरती तके इसे

उस पर भी सोना लुटाता है


पंछियों को भी है रवि से प्यार

सूर्योदय से ही इठलाने लगे

जब घर को अपने चला रवि

पंछी भी घर को जाने लगे


कल फिर आना मेरे प्यारे सूर्य

तुम प्राण हो अपनी धरती के

जब तक न तुम्हें निहार ले ये

अपने ही अंधेरों में सिमटी रहे।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract