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Ambika Nanda

Abstract

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Ambika Nanda

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तजुर्बा

तजुर्बा

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सब को, सब कुछ कहां मिल पाता है?

कुछ हाथ आता है,और कुछ,

हाथ आते - आते बस यूं ही,

महीन रेत की तरहा हाथ से फिसल जाता है।

मानो या न मानो,

पर वो तजुर्बा ही तो ज़िन्दगी कहलाता है।

अपने और गैरों का फर्क,

वह दिल का घाव करवाता है। 



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