मैं, और उनकी यादें ।
मैं, और उनकी यादें ।
एक पल ऐसा आता है
जब रात को हम दोनो साथ होते हैं
सिसकता है रूह, मन में उथल-पुथल होती है
अंदर का ज्वारभाटा फूट पड़ता है
आँखों से, फिर तकिया भीग जाता है
ऐसा तब होता हैजब होते हैं हम साथ-साथ
मैं, और उनकी यादें
अचानक एकांकीपन में एक हलचल होती है
जैसे शांत जल में किसी ने कंकर मार दिया हो
फिर क्या! पलकों का किनारा भीगना लाज़मीय है
तब एकबार फिर से, जिन्दगी से नफ़रत हो जाती है
तब एकबार फिर से, मौत की जरूरत महसूस होती है
ऐसा तब होता हैजब होते हैं हम साथ-साथ
मैं, और उनकी यादें
कभी रात की आहट महकने लगती है
कभी दिन का निकलना बेमानी लगता है
कशिश के साथ कुछ, भरा-भरा सा लगता है
सांसें चलती हैं और, रूह अधमरा सा लगता है
कभी ऐसा लगता है की खुदा की नेयमत
मिलने वाली है, पर निराशा ही हांथ लगती है
कतिपय ऐसा होता हैजब होते हैं हम साथ-साथ
मैं, और उनकी यादें
सिमट आता है सारा आलम
ऐसा लगता है की मेरे लिए सबकुछ ठहर गया हो
उतरा हो एक मुसाफ़िर सिर्फ
मेरे लिए और क़ाफ़िला कूच कर गया हो
पर अफसोस, ये सब महज़
एक इत्तेफ़ाक़ होता है
हम जिसे आँखों में संजोते हैं
वो एक ख़्वाब होता है
किसी के पहलू में सिमटकर
रोने का एहसास होता है
होठों पे सिसकियाँ होती है,
और मन उदास होता है
ऐसा तब होता है, जब होते हैं हम साथ-साथ
मैं और उनकी यादें।

