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V. Aaradhyaa

Tragedy

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V. Aaradhyaa

Tragedy

मानव अब पशु भी ना रहा है

मानव अब पशु भी ना रहा है

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कितना कुछ तो इस जग में देख लिया ,

अब क्या ये भी देखना बाकी रहा है ?


इंसान धीरे धीरे पशु से पराजित होकर ,

खुद पशु में परिवर्तित होता जा रहा है !


जीवन के दुर्गम मार्ग पर चलकर ,

अपना अदम्य साहस खोता जा रहा है!


ज्ञानेंदृयाँ सुप्त सी पड़ती जा रहीं हैं ,

तभी अपनों का दिल दुखाता जा रहा है!


मानव जन्म कितना उत्तम व दुर्लभ है,

आज मानवता का मूल भूलता जा रहा है!


चाहे पशु से करे बराबरी या समकक्ष बने,

सच तो है कि मानव अब पशु भी नहीं रहा है!



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