मां का आंचल
मां का आंचल
तेज धूप लग गई मुझे है
आंखे हो गई पागल सी
कैसी चिलचिलाती गर्मी ये
छांव मिले मां के आंचल सी।
सुबह जल्दी उठी मैं आज
दूर सफर पर मुझे जाना था
तौलिया तो रख लिया था मैंने
पर वो कोमल नहीं तेरे आंचल सा।
कभी थी प्यास मुझे जो लगती
जब देती लगे तो गंगाजल सा
जब कोई दुखाए दिल को मेरे
साया मिले मां तेरे आंचल सा।
तेरी आंखों से निकला पानी
मुझे लगे वर्षा है बादल का
मैं जब भी रोई अकेले में तो
स्मरण हुआ मां तेरे आंचल का।
मिट्टी का हो चूल्हा जलता
दाना पकाए तू चावल का
थाली में परोसकर जब लाए
छलनी हो मां तेरे आंचल का।
