लाश
लाश
जाने कब से वे लाशें यूँ ही पड़ी थी, लावारिस,
कोई भी उन्हें कंधा देने की नहीं कर रहा था कोशिश,
हम में से ही किसी ने उनका कत्ल कर के फेंक दिया होगा।
नहीं, शायद मैं गलत बोल गया…..
किसी एक ने नहीं, हम सब ने
जी हाँ,
हम सब जिम्मेदार है उन्हें मौत के घाट उतारने के लिए।
और इतना ही नहीं…
एक एक लाश के चोगे में न जाने कितनी लाशें छिपी हैं?
उनमें लिपटे हैं किसी के संस्कार,
बिखरे पड़े हैं किसी के सपने,
किया है किसी ने सशक्त प्रहार
झिंझोड़ डाली सारी उम्मीदें, और मानवीय भावनाएँ,
बिखर गये हैं किसी के सपने।
रूठ गये हैं सारे अपने।
लहूलुहान पड़ा है हमारा लोकतंत्र
तड़प रहा है आस्थाओं का मंजर।
कितनी बेदर्दी से मारा होगा किसी ने।
मेरे सामने पड़ी थी लावारिस सी लाशें बनकर
हमारी सारी आस्थाएं,
औ मानवता की भावनाएँ।
और पड़ी थी हमारे अधिकारों की चितायें।
बहुत डरावना था यह क़हर।
आज मानवता का, संस्कारों का, विचारों का,
सद्भाव और सौहार्द का, सच्चाई का, समन्वय और समरसता का,
और भी न जाने किस किस का
हनन हुआ होगा
ये अनगिनत लाशें
उम्मीदों और सपनों की चीथड़े चीथड़े हुई देह
मेरे सामने खून से लथपथ पड़ी थी
मानो मुझ से कह रही थी……
“क्या हुआ, बहुत बड़ी बड़ी बातें करते थे तुम तो
हर मंच से, हर सभागार में, कि ऐसा होना चाहिए,
वैसा नहीं होना चाहिए, हम संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, पर सब बेकार,
अब तो तुम मूक दर्शक बने लाचार खड़े हो?”
मुझे लग रहा था जैसे किसी ने मुझे जोरों का तमाचा
जड़ दिया हो।
मैं उन लाशों को झंझोड़ता गया
तभी और भी लाशें दिखाई दी, कुछ जानी पहचानी सी
हिम्मत और मेहनत भी दम तोड़ चूकी थी,
लाश में तबदील हो चूकी थी
पास ही एक लाश निर्वस्त्र पड़ी थी
“अरे यह क्या, यह तो मेरे ही स्वाभिमान की देह थी।'
और साथ में जकड़े हुए थे बहुत से जज्बात।
मौत का ऐसा मंजर आज तक मैंने नहीं देखा था।
पाँव लड़खड़ा रहे थे, मैं वहीं बैठ गया और रोने लगा।
साथ ही सोचने लगा, “क्या यह रोने का वक़्त है? शायद नहीं?
बातें करने का भी वक़्त नहीं, अब तो कुछ करने का वक़्त दस्तक दे रहा है।
इन लाशों को पुनर्जीवित करना होगा।
सब कुछ व्यवस्थित और समन्वित करना होगा।
लोगों के सोये जमीर को जगाना होगा।
सुभाष बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, शहीद भगत के भारत को वापस पाना होगा।
कृष्ण और श्री राम की इस धरा पर फिर से जीवन लाना होगा।"
और मैं चल पड़ा, अगली भोर की तलाश में,
इन लाशों के ढेर से जिन्दगी को वापस पाने के लिए।
तभी किसी के हिलने का आभास हुआ।
देखा तो उम्मीद थी।
शायद कुछ जान बची थी।
पास गया तो बुदबुदा रही थी, “पानी”।
मैंने उसे पानी पिलाया,
और कंधे पर उठा लिया
और चल पड़ा।
तभी मेरी नींद खुल गई।
देखा आसमान में सूरज चमक रहा था
उम्मीद की नई किरणों के साथ
सुबह का आगाज़ लेकर।
