STORYMIRROR

Jiwan Sameer

Romance

4  

Jiwan Sameer

Romance

क्यों छुपाये बैठी हो

क्यों छुपाये बैठी हो

1 min
391

मादक मनुहार लिए

कामनाओं की ठांव लिए 

प्रेम भरा पैगाम लिए 

स्नेह का साराा गांव लिए

आंचल से ढक

लरजती गोरे मुखड़े को

क्यों छुपाये बैठी हो

क्यों शरमाये बैठी हो


तन की सीमा में 

मन की मीमांसा में 

सिसकी की अविरल धारा ले

विकल प्रााणों की कारा में

हाथ में लेकर टुकड़ा

कागज का

क्यों छुपाये बैठी हो 

क्यों भावनाएँ दबाये बैठी हो


डगमगाते डग धूल धूसरित पग

उड़ते नहीं खग उमगित होकर भी रग रग

दिल के दरवाजे ढक

प्रेम की गोधूूलि में

चंचल मन पंछी को

क्यों छुपाये बैठी हो 

क्यों ताला लगाये बैठी हो


उठते इन हाथों को

विनती भरे जज्बातों को

छूटे शब्दों के उलाहनों को

भ्रमर के लुभावनोंं को

हहराती स्पर्श के 

स्पंदन से

अधरों पर लालिमा

क्यों छुपाये बैठी हो 

क्यों मुरझाए बैठी हो!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance