STORYMIRROR

Jiwan Sameer

Abstract

4  

Jiwan Sameer

Abstract

गुमसुम गुमसुम तुम भी

गुमसुम गुमसुम तुम भी

1 min
374

गुमसुम गुमसुम तुम भी

मैं भी खोया खोया सा हूूँ


खामोश गगन की छाया में

शंकित कुंठित तुुुम भी 

मैं भी सकुचायाा सा हूूँ

रिमझिम रिमझिम तुम भी

मैं भी भीगा भीगा सा हूूँ


आज रो लो तुम भी तनिक

मैं भी सिसकी भर लूं

बंद नयनों के आलिंगन मेें

गीतों के कलरव मधुर कर लूं


बदली बदली तुम भी

मैं भी टूटा टूटा सा हूूँ


सच्चाई के इस दलदल में

निकल झूठ के मलमल से

ढीठ संदर्भों से कटकर

राख हुए जल जल के


बिखरी बिखरी तुम भी

मैं भी रीता रीता हूूँ

हारी तो तुम भी नहीं

मैं भी अजीता अजीता सा हूँ


हंसते-हंसते रो जानेे पर

चलते चलते रूक जाने पर

रिश्तों के अजब झमेले हैं

फासलों के आयोजन पर


खुशी-खुशी में मरे मरे से

संकेेतों में सहमे सहमे से

तीब्र वेग से बढता ही जाता

ठहरा रहा जो काल युगों से


शरमाती शरमाती तुम भी

मैं भी भीता भीता सा हूूँ

दर्पण के छली पन्नों में

मैं भी खुला खुला सा हूूँ


गुमसुम गुमसुम तुम भी

मैं भी खोया खोया सा हूँ!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract