क्या विडंबना है उस मां की
क्या विडंबना है उस मां की
क्या विडंबना है उस मां की ,
कैसा क्रूर मजाक है ये,
जिसे कोख से जन्मा,
जिसको दिया आकार ,
जिसको उंगली पकड़ कर चलना सिखाया,
जिस मां ने बनाया साक्षर इस जगत में ,
आज वही निरक्षर बन गई,
अब उसकी बात हो गई अनसुनी,
यह कैसी विडंबना है उस मां की ।
मां की उम्मीदें, सपने दबे रह जाते हैं,
संतान की ऊंची आवाज़ में,
पर वो कहती है, अनुभव की बातें,
पर संतान सुनाती गूगल सर्च के किस्से,
आज अनुभव गूगल सर्च से छोटा पड़ जाता है।
कैसा स्याह सच है,
जब रिश्तों का व्याकरण ही समझ ना आ पाता।
मां शिक्षित होकर भी,
अनपढ़ कहलाई जाती है,
क्योंकि संतान की नज़र में,
उसकी समझ कमज़ोर है ,तर्क विहीन है,
उसकी बातें बस कहानी रह जाती है,
यह कैसी विडम्बना है उस मां की ।
रिश्तों की पाठशाला में,
जो हर रोज़ विफल होती है,
अपनी ही संतान के हाथों से
यह कैसी विडंबना है उस मां की ।
