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राजेश "बनारसी बाबू"

Classics Inspirational

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राजेश "बनारसी बाबू"

Classics Inspirational

कुम्हार की व्यथा*

कुम्हार की व्यथा*

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मैं भूखी लाचारी हूंँ,

गत दिन से भूखी प्यासी हूँ।

मैं एक अबला लाचारी हूँ,

यह वर्षा ऋतु मोहे सतावे।


मिट्टी कि कमी हमें सतावे,

मिट्टी दुआर संग्रह करना पड़ जावे।

प्रातः उठ कर नदी मै जाऊं,

परिश्रम कर मिट्टी मै लाऊं।


मैं एक परिश्रमी कुम्हारिन हूंँ,

मैं एक स्वाभिमानी मांँ भी हूं।

रोज प्रातःउठ मैं मिट्टी को गूथूँ,

उन मिट्टी से बर्तन बनाऊँ।


चाक काटत काटत सांँझ हो जावे,

लोगन के बर्तन नहीं सुहावे।

लोगन के लिए इ मिट्टी होवत,

हमारे लिए इ हमार आत्मा होवत।


रंग बिरंगी रंग मैं चढ़ाऊं,

कलाकृति ब्रश से रच के दिखाऊं।

उकेर उकेर रच रच मैं ब्रश मैं चलाऊँ।

अपनी आत्मा बर्तन में मैं डालूँ,

 परिश्रम कर मैं उसे सुखाऊँ।


उपले ढूढ़ूँ लकड़ी ढूढूँ फिर मैं,

भट्टी मे मै सुलगाऊं।

भीसड़ गर्मी अधिक सतावे,

भट्टी पे टप तप पसीना मोहे आवे।

अपनी जिंदगी बेरंग होवे ,

मिट्टी बर्तन पे हर रंग चढ़ाके।


मन में आशा की दीप जलाऊं,

सबके दुआर खूब चिल्लाऊ।

पर एक बर्तन बेच न पाऊं।

कर परिश्रम रंग चढ़ाऊ,

फिर तुम मालिक के रास न आवे।


कुम्हार जीवन बड़ा है व्याकुल।

सबेर सांझ कर मेहनत करूं निश दिन।


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