STORYMIRROR

Sarika Jinturkar

Abstract

4  

Sarika Jinturkar

Abstract

कुछ ना कुछ छूटना..

कुछ ना कुछ छूटना..

1 min
459

छूट गया वो बचपन 

वाले सभी यारो का साथ  

अब तो बस पास है साथ बिताये 

कुछ लम्हे और कुछ संजोए जज्बात 

छूट गई दादा की प्यारी सी डाट और दादी से सुनी हुई

 परियो की कहानी  

दूर अपनो से अंजान शहर मे बसा 

ली है हमने एक अलक दुनिया अपनी  


छूट गया अब पीछे हमसे सारा पर्व त्योहार

अब तो बस रह गई दिल मे यादे बेशुमार  

छूट गया नादान बचपन, बारीश मे कागज की कश्ती

अब आयी समझदारी नजदीक किनारा

लेकिन छूट गई मंजिलें सारी  


इसलिए 

कुछ ना कुछ छूटना तो लाजमी है जिंदगी.. 

सब कुछ हासिल नहीं होता जिंदगी में

यहा किसी का "काश" तो किसी का

 "अगर" छूट ही जाता है ..

 कुछ न कुछ छूटना तो लाजमी है

जिंदगी बनते बिगडते हालातों का 

हिसाब है जिंदगी 

हर एक रोज एक नया पन्ना 

जुड़ता है जिसमे,

वह ही एक किताब है जिंदगी...


जिंदगी एक हसीन पल है, जिसमे 

ना आज है ना कल है

 जिलो इसे अपने मुताबिक 

 ठान लिया तो जिंदगी का हर 

एक हसीन, खूबसूरत पल है

कुछ न कुछ छूटना तो लाजमी है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract