STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Tragedy

4  

Kanchan Prabha

Tragedy

कंपन सी जिंदगी

कंपन सी जिंदगी

1 min
337

नजरों का धोखा है या सपना सा

क्या नाम दूँ जो ना लगे अपना सा?

आसमां के बदलते इस रंग की

जल में फेंकें पत्थरों के तरंग की।


पल पल में कोई खौफ सा समाया है 

कैसा वक्त है जो तूफां ले कर आया है?

महामारी से जिन्दगी के इस जंग की

जल में फेंकें पत्थरों के तरंग की।


धरती लाल सी हुई, आँखें नम सी हुई

मुस्कराहट में छिपी सूरतें गम सी हुई

साथ ये कैसा अकेलेपन के संग की

जल में फेंकें पत्थरों के तरंग की।


फिर से वही पुराने दिन कोई लौटा दे

छम छम बूंदें और खुशियों की छटा दे

सिमट जाये काली चादर ये मतंग की

जल में फेंकें पत्थरों के तरंग की।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy