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Bhavna Thaker

Tragedy

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Bhavna Thaker

Tragedy

किसने गढ़ी

किसने गढ़ी

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किसने गढ़ी ये पहली औरत 

कठपुतली सी, नतमस्तक खड़ी 

मर्द से कमतर, कमज़ोर समझी जाने वाली?


चुप्पी के गहने पहनाकर शर्म की बेड़ियों से लदी और जिम्मेदारियों की मूरत सी 

उसी स्त्री की कोख ने पैदा की फिर अनेक बेबस स्त्रियाँ। 


कुआँ खोद लेती है अपने भीतर दमन सहने की शक्ति का, 

पहुँच भी जाए चाँद पर चाहे या बड़ी कंपनी की मैनेजर

घर की मुर्गी दाल बराबर समझी जाने वाली औरतें

सच में दाल सी आम ही बनी रहने में माहिर है।


मर्द की सोच को सलाम करती मर्द के ही मापदंड पर खरी उतरती

ऐसी स्त्री ने कभी दूसरी स्त्री को ये भूलने ही नहीं दिया की तुम एक स्त्री हो।


क्यूँ आज़ाद सोच का बीज नहीं बोती, लड़की की माँ बनते ही लग जाती है

हर स्त्री उस कार्य में जो बेटी को सहनशीलता की मूरत बनाकर उभारता है।


क्यूँ मुखौटा पहन लेती है हर औरत झूठी हंसी का?

कमज़ोर, बेबस, लाचार जैसे शब्दों को पीठ पर लादें उम्र काट लेती है।


पुरुष ने नहीं गढ़ी ऐसी स्त्रियाँ स्वयं स्त्री ही स्त्री को स्त्री बनाती है

गुलामी की परिभाषा को पिरोती है बेटी के अंग अंग में और महान बन जाती है।



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