ख्वाब
ख्वाब
मेरे ख्वाब सब अधूरे रह गए
एक भी पूरा नहीं हुआ।
ख्वाब क्या थे, हसरतें थी
सब हसरतें ही रह गई।
ख्वाब था कि माँ के आंचल से बंधे रहे
ओढ कर आंचल वक्त की धूप से बचे रहे।
ख्वाब था कि प्यार से देख कर मेरी अधनिंदी आंखे
मेरे माथे को चूमती हुई वो सीने से लगाए।
ख्वाब था कि पिता के कंधे के बराबर हो
थोड़ा बोझ उनके कांधे से लेकर साथ चले
ख्वाब था कि वो मुस्कुरा कर देखें मुझे
और थोड़ा घमंड से मेरे सर को थपथपाए।
ख्वाब था कि किसी की मखमली जुल्फों को सहलाऊ
गोद में सर रख उसकी आंखों में साहिल पाऊं
ख्वाब था सारे दिल के राज खोल कर रख दूं उसके सामने
और थोड़ा सा सुकून साथ उसके पा जाऊं
ख्वाब था कि बच्चों को कोई कमी न आने दूं।
उनकी हर ख्वाहिश को सर माथे लगाऊं
ख्वाब था बड़ा होता देखूं अपने बच्चों का बचपन
और उनके बच्चों को ताउम्र कहानियां सुनाऊं
ख्वाब था कि मेरे दर से कोई खाली न जाए
जैसे भी हो हालात मेरे, उसके हालात में काम आऊं
ख्वाब था करु कुछ ऐसा कि सब उसको अच्छा कहे
किसी को दुश्मन न रखूँ, हर किसी का दोस्त हो जाऊं
मगर सब ख्वाब अधूरे रहे जाते है
सुबह होते ही सब रंग बिगड़ जाते है
ख्वाब देखने में कोई बुरी बात नजर नहीं आती
उनके सहारे ही हम ज़िन्दगी गुजार पाते हैं
मगर
एक नौकरी जाते ही सब फना हो जाते है
सारे ख्वाब और हसरतें धरी सी रह जाती है
ज़रूरतें बताती रहती हैं कि तुम थक नहीं सकते
मुझ से कुछ भी हो जाए लड़ नहीं सकते।
ख्वाब कितने ही टूट गए और
कितने ही अभी बेचने बाकी हैं
ज़िन्दगी चल रही है अपनी लय पर,
ये लय अभी टूटनी बाकी हैं
ख्वाब ही तो थे, ख्वाब ही रहेंगे।
इस ख्वाब के सिलसिले तो उम्र भर चलेंगे
विवेक.......
