ईश्वर
ईश्वर
ईश्वर…
शायद
आसमान में बैठा कोई नाम नहीं,
बल्कि
धरती पर बँटी हुई ताक़त का
एक पुराना ऐलान है।
जिसके हाथ में राजदंड आया,
उसने अपने डर को
“धर्म” कह दिया,
और अपनी सत्ता को
“ईश्वर की इच्छा”।
मंदिरों की घंटियों से लेकर
महलों की दीवारों तक,
हर दौर में
किसी न किसी ने
अपने सिंहासन के नीचे
एक अदृश्य भगवान छुपा रखा था।
जो झुकते रहे —
उन्हें भक्ति सिखाई गई,
जो सवाल करते रहे —
उन्हें पापी कहा गया।
भूखे आदमी के हिस्से में
प्रार्थना आई,
और तृप्त लोगों के हिस्से में
ईश्वर का अधिकार।
किसी माँ ने
रोटी माँगी थी,
उसे कर्मों का फल समझाया गया।
किसी मज़दूर ने
न्याय माँगा था,
उसे अगले जन्म का सपना दे दिया गया।
और सच तो यह है —
कमज़ोर आदमी
ईश्वर नहीं ढूँढता,
वह सिर्फ़
थोड़ी-सी इंसानियत तलाशता है।
अगर ईश्वर सचमुच होता,
तो शायद
सबसे पहले
उन गलियों में उतरता
जहाँ बच्चे भूख से सोते हैं,
जहाँ औरतें डर में जीती हैं,
जहाँ मेहनतकश लोग
अपनी उम्र गिरवी रख देते हैं।
पर वहाँ अक्सर
ईश्वर नहीं आता,
सिर्फ़
खामोशियाँ आती हैं।
इसलिए अब
कुछ लोग मंदिरों से नहीं,
इंसानों से उम्मीद रखते हैं।
क्योंकि
जब कोई टूटा हुआ हाथ
किसी और का सहारा बनता है —
वहीं शायद
पहली बार
ईश्वर नहीं,
मानवता जन्म लेती है।
एक कविता- विवेक
