यादगार
यादगार
उसके कहने पे एक गुनाह और कर लिया हमने,
भरी बज़्म में इश्क़ का इकरार कर लिया हमने।
जो दरमियाँ था फ़ासला — वही तो आसरा था,
उसे भी पार कर ख़ुद को लाचार कर लिया हमने।
अब ज़िक्र क्या करें कि क्या-क्या उजड़ गया,
एक नाम पर ही सब कुछ निसार कर लिया हमने।
वो पूछता रहा वजह मेरी तबाही की,
तेरा ही नाम था — मगर इंकार कर लिया हमने।
अब क्या कहें वो दास्तान जो बस अधूरी ही रही,
जिसे जी न सके — उसे यादगार कर लिया हमने।
हसरतें जलती रहीं रात भर चराग़ों सी,
और ख़ुद को राख का अंबार कर लिया हमने।
विवेक........
