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Seema Sharma

Classics

4  

Seema Sharma

Classics

जीवन

जीवन

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मेरे जीवन की बगिया में 

तुम बहार बन कर आये थे

पतझड़ से सारे जीवन में 

तुम बहार बन कर छाये थे


जीवन में कलियां थी मेरे 

तुम गुलाब बन कर खेले थे

तेरे संग में मैंने खुशी से 

पूस की रात के दिन झेले थे 


तुमको पाकर इतनी खुश थी

दुख का कुछ एहसास नहीं था

तेरे प्यारे मोहपास मे बंधकर

सच्चाई को मै भूली थी


मुझकों यह अहसास था 

आठ माह में तुम आये हो

नजर फेर के तुम चल दोगे

सबने हमकों समझाया था


फिर वो दिन भी भीषण आया

तेरे जाने का दिन आया

सूर्य हुआ जब उत्तरायण

ग्यारस का फिर वो दिन आया


बस ना चला फिर भाग्य पर अपने

हम सबको बिलखता छोड़ कर

माँ की ममता को तड़फा कर

नजर फेर कर कहाँ गए तुम।।


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உள்நுழை

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