कैसे रास्ते हैं
कैसे रास्ते हैं
ये कैसे रास्ते हैं जो मुझे कहीं नहीं ले जा रहे,
मंज़िलें मुझे कभी नहीं चाहिए थीं,
मगर रास्तों से इश्क़ था।
काश तुम साथ रहते तो चलते रहते,
सफ़र ही हमारी दास्तान बन जाता,
और थकान भी एक मीठा-सा बहाना बन जाती।
मुझे कहाँ जल्दी थी कहीं पहुँचने की,
बस तुम्हारे साथ चलना ही काफ़ी था।
कभी धूप से लड़ते, कभी छाँव में ठहरते,
कभी ख़ामोशी में भी बातें कर लेते।
रास्तों की अपनी ही एक ज़बान होती है,
हर मोड़ कोई राज़ सुनाया करता है।
कभी ठंडी हवा का एक झोंका,
कभी पत्तों का यूँ ही गिर जाना,
सब जैसे सफ़र का हिस्सा लगते थे।
मगर अब वही रास्ते चुप हैं,
मोड़ आते हैं — मगर ठहराव नहीं आता।
कदम बढ़ते हैं — मगर दिल पीछे रह जाता है,
जैसे कोई बात अधूरी रह गई हो।
कभी-कभी लगता है
कि रास्ते भी तुम्हें ढूँढते होंगे,
वो पेड़, वो पगडंडी, वो शाम की हल्की धूप
सबको तुम्हारी आहट याद आती होगी।
मैं आज भी उन्हीं राहों पर चल पड़ता हूँ कभी,
शायद यूँ ही अचानक तुम मिल जाओ,
और फिर बिना किसी मंज़िल के
हम उसी सफ़र को फिर से शुरू कर दें।
क्योंकि सच तो ये है—
मंज़िलों से मुझे आज भी कोई मोह नहीं,
मुझे तो बस उन रास्तों से इश्क़ है
जहाँ कभी तुम मेरे साथ चला करते थे।

