धुंधली होती आवाज़
धुंधली होती आवाज़
वो आवाज़ ,
जो दीवारों से टकराकर
घर भर में गूंज जाती थी,
आज
उसी आवाज़ में जैसे ठहराव आ गया है…
वो जो हर बात पर समझाता था,
लंबी-लंबी दलीलें देता था,
अब
ज़्यादा सुनता है, कम कहता है
जैसे अल्फ़ाज़ भी उम्र के साथ
थोड़ा थक जाते हों।
बीच-बीच में रुक जाता है वो,
किस्सा अधूरा छोड़ देता है,
पर उसकी आँखों में
अब भी पूरी कहानी रहती है
वही सलीका, वही समझ,
जो कभी मेरे सवालों का घर हुआ करती थी।
आज भी
दरवाज़े की आहट पर
सबसे पहले वही उठता है,
और जाते वक़्त
धीमे से कहता है—
"ध्यान से जाना…"
जैसे उम्र ने बस आवाज़ छीनी हो,
मोहब्बत नहीं।
वो अब कम बोलता है,
पर हर ख़ामोशी में
मेरे लिए दुआ रखता है—
हर चुप में एक हिफ़ाज़त छुपी है,
हर नज़र में एक पुराना साया।
तो अगर कभी
तुम्हें वो ख़ामोश लगे,
तो पास बैठ जाना—
क्योंकि
कभी तुम भी
उसकी आवाज़ में अपनी दुनिया ढूँढते थे।
और याद रखना—
बाप
कभी बूढ़ा नहीं होता,
बस…
उसकी आवाज़ धीरे-धीरे
दिल में उतर जाती है।
