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Vivek Mishra

Classics Inspirational Others

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Vivek Mishra

Classics Inspirational Others

ज़िंदगियाँ

ज़िंदगियाँ

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कभी-कभी यूँ ही ठहरकर सोचता हूँ मैं,
मेरे भीतर कितनी ज़िंदगियाँ धड़कती हैं—
कुछ अधूरी बातों की सरगोशियों में,
कुछ अनकहे ख़्वाबों की ख़ामोशियों में।

वो लफ़्ज़, जो होंठों तक आकर भी कहे न जा सके,
वो फैसले, जो दिल में ही कहीं लिए गए,
वो रास्ते, जो बस ख़यालों में मुड़कर रह गए—
बस हर मोड़ पर एक अलग “मैं” रह गया।

हर “काश” में एक अधूरी दास्ताँ है,
हर “अगर” में एक पूरी दुनिया,
मैं जीता हूँ बस एक ही हक़ीक़त,
पर सोचता हूँ हज़ारों ज़िंदगियाँ।

और फिर अचानक समझ आता है—
ये जो मेरी असली ज़िंदगी है,
कितनी सादा, कितनी ख़ामोश है,
उन तमाम शोर भरी कल्पनाओं के सामने
जो हर रोज़ मेरे भीतर जी उठती हैं।

शायद जीना यही है—
जो है, उसे थाम लेना,
और जो नहीं मिला,
उसे ख़्वाब बनाकर मुस्कुरा देना।


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