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Vivek Mishra

Romance Others

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Vivek Mishra

Romance Others

हम सफर

हम सफर

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दिन भर की भागदौड़, थकान, उलझनें…
सब मिलकर आदमी को अंदर से खाली कर देती हैं।
और मैं…
घर लौटता हूँ तो लगता है 
बस एक और दिन बीत गया,
पर दरवाज़े के उस पार कोई मेरा इंतज़ार करता है…
कम बोलना, जल्दी थक जाना,
अपने ही ख्यालों में कहीं खो जाना।
एक बारगी बस यूँही चुप हो जाना
मगर उसी चुप्पी के बीच,
एक आवाज़ हर रोज़ आती है…
धीमी सी, सादी सी,
पर दिल को थाम लेने वाली—
वो… मेरी हम सफर
जो हर सुबह बिना कुछ कहे
मेरी ज़िंदगी को फिर से शुरू कर देती है,
मेरी बिखरी हुई जिंदगी को
अपने हाथों से समेट लेती है।
वो मेरे दिन को पालती है,
ठीक वैसे ही…
जैसे कोई माँ बच्चे को थामकर चलना सिखाती है।
दिन भर वो भी थकती होगी,
पर मेरे लिए मुस्कान बचाकर रखती है,
मेरे हर "ठीक हूँ" के पीछे छिपी थकान
चुपचाप पढ़ लिया करती है।
मेरी थकान को समझती है,
मेरी खामोशी को पढ़ लेती है,
और बिना सवाल किए
मेरे हिस्से की परेशानियाँ भी जी लेती है।
और कभी बस इतनी सी बात कहकर
मेरे पूरे दिन का बोझ हल्का कर देती है—
कभी कहती है कि क्यों नाहक परेशां होते हो
जितना तुमने कर लिया, कौन कर पाता है। 
न बड़े वादे, न बड़े लफ्ज, न बड़े दिलासे
बस छोटे-छोटे ख्याल,
जो मेरी पूरी दुनिया संभाले रहते हैं।
और फिर…
दिन के किसी मोड़ पर,
वो हल्के से कहती है—
"सुनो, चाय चढ़ी है… गैस बंद कर दोगे?"
और सच कहूँ…
उसी एक पल में,
मेरी सारी उलझी हुई ज़िंदगी
फिर से संभल जाती है।
वो शब्द नहीं,
मेरी ज़िंदगी का सबसे सुकून भरा एहसास हैं…
क्योंकि उनमें सिर्फ़ चाय नहीं,
उसका प्यार, उसकी परवाह,
और मेरा पूरा जहाँ बसता है।


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