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Vivek Mishra

Classics Inspirational Others

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Vivek Mishra

Classics Inspirational Others

थोड़ी सी असहजता,

थोड़ी सी असहजता,

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कभी-कभी

सब कुछ समझ में आ जाना

सबसे बड़ी कमी होती है…

और

थोड़ा-सा असहज, थोड़ा भ्रांति में रह जाना

ज़िंदगी की सबसे सच्ची स्थितियों में हैं 

क्योंकि

जहाँ सवाल होते हैं,

वहीं तलाश जीवित रहती है—

और जहाँ तलाश जीवित  है,

वहीं इंसान जीवित होता है।


अर्जुन भी तो

एक पल के लिए रुका था—

हाथ काँपे थे,

मन बिखरा था…

और उसी बिखराव से निकली थी

एक पूरी गीता।


तो अगर आज

तुम्हें नहीं पता

कि कौन-सी राह तुम्हारी है,

तो ठहरो…

घबराओ मत…

हो सकता है

यही तुम्हारी गीता

लिखे जाने का वक्त हो


ठीक वहीं से शुरू करो अपनी 

असली तलाश।

क्योंकि साफ़ रास्तों पर चलना

कोई हुनर नहीं होता,


हुनर तो तब है

जब धुंध के बीच भी

तुम अपने कदमों की आहट पहचान लो—

जब सन्नाटे में भी

तुम अपनी ही आवाज़ सुन सको।

ये जो असहजता है ना…

ये कोई कमी नहीं,

ये एक दरवाज़ा है—

जिसके उस पार

तुम्हारा असली “तुम” खड़ा है,

खामोश…

पर इंतज़ार में।

लोग कहते हैं—

“फैसला लो, साफ़ सोचो, आगे बढ़ो…”

पर कोई ये नहीं बताता

कि साफ़ सोच अक्सर

दूसरों की आवाज़ों से बनी होती है,

और अपनी आवाज़

हमेशा थोड़ा उलझी हुई,

थोड़ी बिखरी हुई होती है…

पर वही सच्ची होती है।


अर्जुन भी तो

उसी भीड़ में खड़ा था—

जहाँ हर किसी को पता था

कि लड़ना है।

पर वो…

एक पल के लिए रुक गया।

उसने अपने ही हाथों से

अपने यक़ीन को नीचे रख दिया,

अपने अहंकार को थोड़ी देर के लिए

चुप करा दिया,

और पूछा—

“क्या सच में यही रास्ता है?”

वो असहज था…

कमज़ोर नहीं।

और शायद

उसी एक पल की उलझन में

इतनी गहराई थी

कि उसके लिए 

एक पूरी गीता जन्म ले सकी।


एक ऐसा जवाब सबके लिए था।


सोचो…

अगर उसे सब पता होता,

अगर वो भीड़ के साथ

बस चल देता—

तो शायद

ज़िंदगी से हमें वो जवाब कभी नहीं मिलते,

जो आज भी हमारे भीतर

एक रौशनी की तरह जलते हैं,

अंधेरों में भी

रास्ता दिखाते हैं।




तो अगर आज

तुम किसी मोड़ पर खड़े हो,

जहाँ दिल और दिमाग

दो अलग दिशाओं में खिंच रहे हैं…

जहाँ एक आवाज़ कहती है—

“चलो…”

और दूसरी पूछती है—

“क्यों?”

तो घबराना मत।

क्योंकि यही वो जगह है

जहाँ तुम दूसरों जैसे नहीं,

खुद जैसे बनते हो।

यही वो खामोश पल है

जहाँ तुम्हारे अंदर

एक नई आवाज़ जन्म ले रही होती है—

धीरे-धीरे,

संभलकर,

पर सच्ची।

वो आवाज़

जो शोर में नहीं,

सन्नाटे में सुनाई देती है…

जो जल्दी नहीं करती,

पर कभी ग़लत नहीं होती।

और शायद…

सालों बाद

जब तुम पीछे मुड़कर देखोगे,

तो समझोगे—

कि वो असहजता, वो भ्रांतियां 

कोई रुकावट नहीं था,

वो तो एक शुरुआत थी।

एक ऐसी शुरुआत

जिसने तुम्हें

दुनिया से नहीं,

तुमसे मिलाया।

और तब

तुम्हें एहसास होगा—

कि जवाब पाने से ज़्यादा ख़ूबसूरत

सवालों में जीना था।


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