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V. Aaradhyaa

Abstract Classics Inspirational

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V. Aaradhyaa

Abstract Classics Inspirational

कौन किस घर का है

कौन किस घर का है

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हर जगह ऐसी अराजकता फैली है कि,

कौन कहाँ धाराशयी होगा नहीं जानते !

रिश्तों के उलझे मोती यूँ बिखरते हैं कि,

कौन किस घर का है नहीं पहचान पाते !


बारिशों में अपने अश्क़ को छुपा लेनेवाले,

अब खुलकर रोने की रील बनाने लगे हैं !

अश्क जैसे समंदर से गुफ्तगू कर रहे हैं,

और वह आँसू बेचकर पैसे कमा रहे हैं !


पुराने अफसर नए को सिखाकर जा रहे हैं,

टेबल के नीचे तू भी खा जैसे हम खा रहे हैं !

वक़्त की रफ़्तार में सब बहते चले जा रहे हैं,

इंसानियत का चेहरा अब खोते चले जा रहे हैं !


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