कौन किस घर का है
कौन किस घर का है
हर जगह ऐसी अराजकता फैली है कि,
कौन कहाँ धाराशयी होगा नहीं जानते !
रिश्तों के उलझे मोती यूँ बिखरते हैं कि,
कौन किस घर का है नहीं पहचान पाते !
बारिशों में अपने अश्क़ को छुपा लेनेवाले,
अब खुलकर रोने की रील बनाने लगे हैं !
अश्क जैसे समंदर से गुफ्तगू कर रहे हैं,
और वह आँसू बेचकर पैसे कमा रहे हैं !
पुराने अफसर नए को सिखाकर जा रहे हैं,
टेबल के नीचे तू भी खा जैसे हम खा रहे हैं !
वक़्त की रफ़्तार में सब बहते चले जा रहे हैं,
इंसानियत का चेहरा अब खोते चले जा रहे हैं !
