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Dr.Purnima Rai

Tragedy Classics Inspirational

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Dr.Purnima Rai

Tragedy Classics Inspirational

एक अकेला

एक अकेला

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एक अकेला कब तक भागे

नित नयी चाहत मन जागे

दौड़ भरी जीवन की राहें

निस दिन झेले गम की आहें


श्रम की गठरी सिर पर लादे

नेक हैं उसके मन के इरादे

मंजिल पर जब कदम बढ़ाये

श्रम साहस का गान सुनाये


पर्वत सम मुश्किल जब आये

मंद स्मित से लब मुस्काये

दुश्मन भी उसे लगते अपने

"पूर्णिमा " पूर्ण करता सपने।


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