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Meena Mallavarapu

Tragedy

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Meena Mallavarapu

Tragedy

कठपुतली

कठपुतली

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कठपुतली ही तो हूं मैं

तेरे हाथों की , ऐ ज़िंदगी!

जैसे चाहा खींचा,मरोड़ा

जैसे चाहा गिराया,उठाया!

ऐसा लगता था कभी मुझे

निर्धारित कर रही हूँ मैं ख़ुद

अपनी सीमाएं , रेखाएं-

लगता था मुझे ,विकल्प हैं आगे

स्वामिनी हूं मैं अपनी

चुनूंगी जो भी मैं,होगा वही!

भूल थी मेरी ,दे बैठी

ख़ुद को इतनी तवज्जो!


अनजान दो हाथों मे है

अपने जीवन की कच्ची डोर-

अब टूटी तब टूटी -

विडम्बना से व्यथित,भय एक ओर!

डगमगाती हुई ज़िंदगी

कदम अभी तो थे ज़मीं पर-

पल में मगर ,पाँव तले है खाई!

आवाज़ें गूंजती हैं कानों में !

यह खेल है पल भर का

इठलाले पल दो पल-

तेरा आना-जाना,होना न होना

है सब कुछ एक

तेरे आंसू ,तेरी मुस्कान,तेरी हंसी

हैं क्षणिक मेहमान-

कठपुतली का यह खेल रहेगा जारी

हम रहें न रहें-

हम सब के किरदारों की यहां

नहीं अहमियत 

किसी की नज़र में -

अपने छोटे से इस मंच पर

इतने ही पल तेरे

बाकी सब है भ्रम,सब माया

कठपुतली को नहीं शोभा देता

ज़िंदगी से पंगा लेना!



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